सच लिख डाला तो आग का गोला हो गये लालजी टंडन

दोलत्ती

: बाबू जी पुरानी पीढ़ी के बचे हुए नेताओं केआखिरी दस्तखतों में से एक थे : खुद को विकास पुरूष कहलाना पसंद था लालजी टंडन को :
सुधीर मिश्र
लखनऊ : खूब गुस्सा किया मैने बाबू जी को, फिर भी करीब रहा। बाबू जी, उम्र का लिहाज कहें या पड़ोस का रिश्ता। मैं भी उन्हें बाबू जी ही कहता था। क्योंकि बचपन ही चौक में गुजरा तो उन्हें जानता तो तब से था, जब से होश संभाला। चौपटिया, खेतगली, रानी कटरा और जियालाल फाटक वालों को जब भी दिक्कत होती तो बाबू जी का घर लोगों की उम्मीद का एक ठिकाना था। ज्यादातर समस्या पुलिस थाने की ही होती थीं, लोगों को लगता था कि बाबू जी का फोन जाने से दरोगा जी कुछ नरम पड़ जाएंगे।
खैर मेरी उनके साथ अच्छी पहचान 1996 से होनी शुरू हुई। उस वक्त बाबू जी के घर को सत्ता का माइट्रोकांड्रिया कहा जाता था। अटल जी के सबसे करीबी लोगों में से थे वो। फिर उस वक्त की मुख्यमंत्री मायावती भी उन्हें राखी बांधती थीं। आवास और नगर विकास मंत्रालय के साथ उन्हें सरकार में नम्बर दो का दर्जा हासिल था। बाद में कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने पर भी उनका रुतबा कम नहीं हुआ। यह वो दौर था जब पार्टी विद डिफरेंस आंतरिक झगड़ों से जूझ रही थी। उसमें चार फड़ चल रहे थे। कल्याण सिंह, कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह और लालजी टंडन। टण्डन जी क्योकि स्थानीय थे, लिहाजा लखनऊ की राजनीति के एक ध्रुव वे हमेशा से रहे।
मैं उस समय लोकल बीजेपी देखता था। साथ में लखनऊ विकास प्राधिकरण और नगर निगम। यानी तीनों वजहों से मेरा उनका साबका पड़ता रहता था। जिस वक्त बीजेपी का झगड़ा चल रहा था, उस वक्त शहर इकाई के जिम्मेदार लोग कल्याण सिंह समर्थक लॉबी के थे। शहर भाजपा की जिम्मेदारी राजेन्द्र तिवारी की थी। कल्याण सिंह के करीबी। मेयर स्व डॉ एस सी राय साहब भी बाबू जी से नाखुश लॉबी वाले थे। ऐसे में मुझे सरकार के भीतर की खबरें बहुत आराम से मिल रही थीं। एक बार नगर निगम के अफसरों से सभासद नाराज हो गए। अफसर टण्डन जी के करीबी थे। राय साहब ने सभासदों का साथ दिया। मुख्यमंत्री आवास तक सभासदों का मार्च निकल गया। राय साहब लीड कर रहे थे। बाबू जी उन दिनों जापान में थे। लौट कर आये तो उन्हें यह बात नागवार गुजरी। राम प्रकाश गुप्त जी और राजनाथ सिंह जी से पहले उनका नाम मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे था। मैं इन सब खबरों को बहुत बारीकी से कवर कर रहा था क्योंकि उसमें लखनऊ की सियासत शामिल थी।
जापान से लौटते ही बाबू जी ने सभासदों को अपने घर पर तलब किया। शहर इकाई के एक नेता ने अपने एक पार्षद के साथ मुझे भी उस मीटिंग में घुसा दिया। एक तरह का स्टिंग समझिये। बाबू जी ने चिल्लाना शुरू किया। दस दस परसेंट कमीशन नहीं खाने देता तो अफसर दुश्मन हो गया। उसे हटाने के लिए मुख्यमंत्री के यहां मार्च करोगे। कुछ सभासद भी जवाब देने लगे कि अफसर मनमानी कर रहे हैं। बहरहाल एक राजनीतिक दल का भीतरी लोकतंत्र कितना मजेदार होता है, यह मैने उस दिन देखा। अगले दिन के अखबार में मेरी खबर पहले पन्ने पर छपी-जब गुस्से से लाल हुए टंडन और भभक पड़े सभासद। इस खबर का बीजेपी की अंदरूनी सियासत में खूब इस्तेमाल हुआ। बाबू जी सीएम की रेस में पिछड़ गए। मुझसे उस वक्त वो बहुत नाराज थे। इसी दौरान मैंने नाला सफाई, स्ट्रीट लाइट और गोमती सफाई की गड़बड़ियों को खूब उधेड़ा। उनकी नाराजगी बनी रही।
इस बीच प्रधानमंत्री और सांसद अटल बिहारी वाजपेयी के दूत के तौर पर लखनऊ में बड़े बदलाव होते रहे। सड़कें चौड़ी हुईं, नए पार्क बने। चौक का कायाकल्प हुआ। कई फ्लाई ओवर और सभागार बने। उन्हें खुद को विकास पुरूष कहलाना पसंद था और मैं लखनऊ के विकास की कमियों को उधेड़ता रहता। हर खबर सीधे उन्हें लगती। इस बीच 2001 में मैं एक दूसरे अख़बार में चला गया। किसी खबर पर बाबू जी बहुत गुस्से में थे। उन्होंने माल एवेन्यू वाले घर पर बुलाया। फिर पूरे गुस्से में समझाना शुरू किया-तुम्हारे नाना और पिता जी मेरे घर आकर बैठते हैं, तुम्हारे पुराने अखबार के मालिक सभासद नहीं बन सकते थे, उन्हें मैने राज्यसभा भिजवाया, तुम्हारे अभी के सम्पादक को मैने अटल जी के साथ लंदन भिजवाया, अब तुम बताओ कि मेरे पीछे क्यों पड़े हो। मैने मुस्कराते हुए कहा-बाबू जी मैं आप का शुभचिंतक हूँ, आप के विभाग में जो कमियां है, वो अफसर नहीं बताते आप को। मैं चाहता हूँ कि आप को सत्य पता हो। खैर नाराजगी में ही मुझे विदा कर दिया।
उस वक्त के संपादक को जाकर मैने पूरा किस्सा बता दिया। उन्होंने कहा कि टण्डन जी का बुरा मत मानना। वो मुंहफट हैं, दिल से बोलते हैं। वैसे यह बात सच भी थी। जब तक वह मंत्री रहे, पावरफुल रहे, अपने साथ 36 का आंकड़ा बना रहा लेकिन जब वह लोकसभा लड़ रहे थे तब उन्होंने घर बुलाकर मेरी तारीफ की। बोले तुम्हारा अखबार और तुम्हीं ईमानदारी से हमारा प्रचार छाप देते हो, बाकी अखबार तो पैकेज डील मांग रहे हैं, यह कैसे दिन आ गए हैं। इस बार मैं दुखी था। लगा कि वहः ठीक तो कह रहे हैं। वाकई बाबू जी पुरानी पीढ़ी के बचे हुए नेताओं केआखिरी दस्तखतों में से एक थे। सबके सुख दुख में शामिल होने वाले। कितने डेमोक्रेटिक थे। नाराजगी जता देते थे पर मन मे कुछ नहीं रखते। बीते 25 साल की उनकी ज्यादातर चाट पार्टियों में मैं आमंत्रित रहता था। उनकी नाराजगी के बावजूद। राज्यपाल बनने के बाद भी उन्होंने साथ में खाने पर बुलाया। बाबू जी का जाना एक निजी नुकसान जैसा है। वह लखनऊ के इनसाइक्लोपीडिया थे। जब कभी फंसता तो उन्हें फोन कर लेता। नवाबों से लेकर लखनऊ के इतिहास तक। हर जानकारी थी उनके पास। खाने खिलाने के शौकीन। खासतौर पर उनकी चाट पार्टी। लोग वाकई उनको बहुत याद करेंगे।
ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे।

( तेज-तर्रार पत्रकारों की पहली पांत में नाम दर्ज है सुधीर मिश्र का। सुधीर इस वक्‍त नभाटा के संपादक हैं।

2 thoughts on “सच लिख डाला तो आग का गोला हो गये लालजी टंडन

  1. सुधीर मिश्र की लाल जी टंडन को दी गयी श्रधांजलि पढ़कर लगा कि कोई तो है जो सही से उन्हे याद कर पा रहा है और उनके लोकतांतरिक योगदान को रेखांकित कर पा रहा है। सुधीर जी को और आपको दोनों का आभार ।

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