तुम निरा मूर्ख हो, या शातिर हत्‍यारे ?

दोलत्ती

: जिसमें विकास को बिठाया था एसटीएफ ने, वह टाटा सफारी स्‍टार्म थी : विकास की गाड़ी पलट गयी, जिससे विकास भागा। लेकिन पलटी थी महेंद्रा टीयूवी गाड़ी : रास्‍ते में बारिश हुई या नहीं, पुलिस पर सवालों के ओले जरूर दगेंगे :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यूपी पुलिस ने अपनी नाक बचाने के लिए पूरे प्रदेश सरकार ही नहीं, देश और प्रदेश में इंसानियत की नाक कटवा ली। काम-धाम धेला भर नहीं किया। केवल बकलोली करते रहे। दिन दूनी रात चौगुनी की स्‍पीड से ईनाम की रकम बढ़वाते रहे। खुफिया-तंत्र तुम्‍हारा ध्‍वस्‍त हो चुका, इसलिए तुम विकास दुबे को खोजने के लिए आम आदमी से मदद के लिए गिड़गिड़ाते रहे। काहिली और सिर्फ लूट पर आमादा रहे तुम, लेकिन केवल दिखावा और पाखंड के लिए नाका, प्‍लाजा या नुक्‍कड़ों पर जगह-जगह पोस्‍टर लगवाते रहे। उसके भतीजे अमर को मार डाला तुमने, जिसकी शादी दो दिन पहले ही हुई थी। उसकी पत्‍नी को जेल में घुसेड़ दिया। विकास की पत्‍नी और बेटे को पकड़ा तो उसे एक गंदी जगह पर कुछ इस तरह बैठने पर आमादा किया, जैसे वह अछूत हो। उसके सात बरस के बेटे को हैंड्स-अप की शैली में घुटनों के बल बैठने पर आमादा किया, मानो तुमको सबसे खतरा सिर्फ उसी मासूम बच्‍चे से था।

सच बात तो यही है कि तुम लगातार काहिल बने रहे और खुद को बचाने के लिए विकास की हत्‍या कर दी तुमने। उसके साथ ही तुमने राजनीति, प्रशासन और पुलिस में कुंडली मारे बैठे शातिर और दोगलों के असली राज को हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न कर दिया। तुम लगातार झूठ पर झूठ ही बोलते रहे।

बहरहाल, पुलिस ने जिस तरह कुख्‍यात अपराधी विकास दुबे का कत्‍ल किया है, उसने पुलिस के चेहरे पर एक सवाल तो टांग ही दिया है, कि यूपी की पुलिस और उसकी एसटीएफ में बैठे लोग पक्‍का चूतिया हैं, या फिर शातिर अपराधी।
झूठ नम्‍बर एक तो यह रहा कि हादसे के पूरे दो सौ घंटों तक पुलिस पूरी अक्षम साबित हुई और उसके हाथ कोई भी सफलता नहीं मिली। पुलिस ने विकास के जितने भी लोगों को एनकाउंटर में मार डालने का दावा किया, वह भी न केवल संदिग्‍ध है, बल्कि सिरे से झूठी ही साबित होता जा रहा है। तुम फिरोजाबाद में अपनी डींगें हांक रहे थे और विकास उज्‍जैन के महाकाल मंदिर में माथा टिकाने पहुंच गया। इतना ही नहीं, उसने मंदिर को खुद ही बताया कि वह ही विकास दुबे है। कानपुर वाला विकास दुबे, जिसे पूरा देश जानता है। उस वक्‍त विकास जिन्‍दा था, और तब तक जिन्‍दा रहा, जब तक कानपुर न आ गया। उज्‍जैन से लेकर यूपी की सीमा तक कोई भी दिक्‍कत नहीं आयी इस यात्रा में। लेकिन इटावा से आगे बढ़ते ही दो-तीन बार पुलिस की गाड़ी लड़ने की नौबत आ गयी। मगर आसपास लोग दिखे तो पुलिस ने अपना एक्‍शन बदल दिया। लेकिन कानपुर से 14 किलोमीटर पहले यह हादसा हो गया।

सवाल यह है कि आखिर यह कैसे हो गया ?

पहला सवाल तो हम एमपी सरकार और उज्‍जैन प्रशासन व पुलिस से पूछेंगे ही कि उन्‍होंने जब महाकाल में उन्‍होने विकास दुबे को दबोचा था, तो फिर यूपी पुलिस को सिपुर्द करने से पहले विकास को अदालम में पेश कर उसका ट्रांजिट-रिमांड क्‍यों नहीं लिया। लेकिन सवाल तो तुम से भी है कि तुमने विकास का ट्रांजिट-रिमांड क्‍यों नहीं लिया।

सवाल तो यह भी है कि जब एक टोल-प्‍लाजा में तुम्‍हारी फोटो दिखी, जिसमें तुम विकास को लेकर उड़ रहे थे। वह गाड़ी थी सफारी स्‍टार्म थी। एसटीएफ की गाडि़यां जब कानपुर में दाखिल हुईं, उस समय तक आज तक व इंडिया टुडे की टीम एसटीएफ के काफिले को लगातार ट्रैक कर रही थी। टीम ने उस सफारी गाड़ी को भी कैमरे में कैद किया जिसमें विकास दुबे बैठा हुआ था। लेकिन जो गाडी पलट गयी वह टीयूवी थी। तुम्‍हारा दावा है कि उज्‍जैन से कानपुर तक तुम कहीं नहीं रुके, फिर यह विकास दुबे ने क्‍या अपनी गाड़ी खुद ही बदल दी, या एमपी वाले मामा और यूपी वाले योगी की संयुक्‍त प्रार्थना से यह कमाल सीधे उज्‍जैन वाले महाकाल ने कर डाला।

तुम्‍हारा दावा है कि गाड़ी पलटने के बाद विकास ने मौके से भागने की कोशिश की थी। कैसे भागा, यह तो बताओ। तुम तो गाड़ी के बीचोंबीच वाली सीट पर बीचोंबीच बैठा कर ले जा रहे थे विकास दुबे को। कार में आगे और पीछे की सीटों पर भी खचाखच भरे थे तुम्‍हारे शातिर शूटर। उनके बीच विकास कैसे भागने लगा। बाकी लोगों ने कार में ही उसे बचाने की कोशिश क्‍यों नहीं की। सामान्‍य तौर पर तो तुम लोग किसी भी व्‍यक्ति को हथकड़ी में जड़ कर उसकी नुमाइश करते हो, ताकि तुम्‍हें भारी रकम मिल जाए, और दूसरे की इज्‍जत मिटियामेट हो जाए। लेकिन विकास जैसे दुर्दान्‍त अपराधी को तुमने हथकड़ी क्‍यों नहीं जड़ी।

तुम दावा कर रहे हो कि विकास दुबे ने एसटीएफ के लोगों के हथियार छीन कर भागने की कोशिश की थी। तुम्‍हारा दावा है कि यूपी के एसटीएफ के लोग यूपी ही नहीं, बल्कि देश की किसी भी पुलिस में मौजूद चुनिंदा पुलिसवालों के तौर पर चुने जाते हैं। सर्वगुण सम्‍पन्‍न बल है तुम्‍हारा। फिर तुम्‍हारे शूटर का असलहा कितनी आसानी से विकास के हाथों पड़ गया, उसका पता ही नहीं चला।

शुक्रवार सुबह करीब साढ़े छह बजे इस गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ। स्पॉट पर मौजूद एक अधिकारी ने कैमरे पर कहा है कि विकास दुबे को अस्पताल ले जाया गया है। इस अधिकारी ने यह भी बताया कि गाड़ी में जो लोग घायल थे, उन्हें भी कानपुर के लाला लाजपत राय अस्पताल ले जाया जा रहा है। लेकिन इसमें बड़ा झूठ। सच बात तो यही है कि यह अस्पताल घटनास्थल से करीब बीस मिनट की दूरी पर है। विकास की लाश को तो तत्‍काल अस्‍पताल ले जाया गया, लेकिन जिन पुलिसवालों को गोली लगने की बात की गयी थी, उनको साढ़े 11 बजे अस्‍पताल ले जाया गया।

दरअसल, कितने ही गहरे राज़ छुपे थे विकास दुबे के पास, जिनके खुलते ही भूचाल आ जाता। ऐसे में नेता, अफसर और पुलिस की तिकड़ी के पास इकलौता रास्ता ही बचा था कि विकास दुबे को मार डाला जाए।

और यही हुआ।

अपनी असफलता को दूसरे की मौत में तब्दील करने में माहिर यूपी पुलिस। इसके बावजूद यूपी पुलिस चाहती है कि हम उस पर यकीन कर लिया करें।

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