मामले खोलने नहीं, दफ्न करने में माहिर हैं नवनीत सिकेरा

दोलत्ती

: पत्रकारों के एक खेमे ने घोड़े खोले नवनीत सिकेरा के प्रोजेक्‍शन में : 1090 की योजना थी अलंकृता की, झटका सिकेरा ने : महिला की नंगी लाश के मामले में अखिलेश-प्रिय सिकेरा ने खूब किया ड्रामा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : नवनीत सिकेरा। सपा-सरकार में सिरमौर। प्रदेश में आईजी। राजनीतिक और प्रशासनिक हलके में चल रही चर्चाओं के मुताबिक योगी-सरकार के दौरान फिलहाल ढक्‍कन। वजह हैं सिकेरा की कार्यशैली। आम तौर पर माना जाता है कि नवनीत सिकेरा हाई-फाई अफसर हैं, जिनके पैर कभी भी जमीन पर पड़े ही नहीं। वैसे भी सिकेरा की ख्‍याति किसी भी मामले में मामले खोलने नहीं, बल्कि मामलों को दफ्न कर देने में माहिर पुलिस अफसर की रही है। खास तौर पर ऐसे मामलों में तो सिकेरा को खासी महारत है, जिसमें उनके आका का इंटरेस्‍ट हो। बस इशारा भर हो, तो क्रिकेट के मैदान में वे मामले की गेंद को कुछ यूं स्विंग कर देते हैं, कि अच्‍छे-खासे खिलाड़ी चारोंखाने चित्‍त हो जाएं।
इसी नवनीत सिकेरा को किसी मलाईदार ओहदे तक पहुंचाने के लिए जोरदार कोशिशें चल रही हैं। प्रचारित किया जा रहा है कि कानपुर में आठ पुलिस कर्मचारियों की हत्‍या दुर्दान्‍त अपराधी विकास दुबे ने की थी, उसके बाद से ही यूपी में लॉ एंड ऑर्डर की हालत बिगड़ गयीं। ऐसी हालत में जरूरत इस बात की है कि यूपी में किसी अनुभवी, कुशल, साहसी और तेज-तर्रार पुलिस अफसर को तैनात किया जाए, जो यूपी को अपराधियों से मुक्‍त करने का माद्दा रखता हो। अफसर ऐसा हो, जिसमें जबर्दस्‍त छवि हो, और कुछ कर डालने का माद्दा भी हो। इस प्रोजेक्‍शन के तहत सरकार को समझाया जा रहा है कि यूपी सरकार जिस तरह कानून-व्‍यवस्‍था के मामले में अपनी छीछालेदर से दो-चार हो रही है, उसका समाधान केवल नवनीत सिकेरा के श्री-करकमलों में ही सम्‍भव है।
तो अब यह समझ लीजिए कि यह प्रोजेक्‍शन किन पत्रकारों की ओर से अभियान के तहत किया जा रहा है। जाहिर है कि उन पत्रकारों की ओर से, जो अखिलेश पार्टी के खेमे में मलाई चाटा करते थे। लेकिन मौजूदा सरकार में उनकी टिफिन-सर्विस बंद हो चुकी है, चिखना तक का संकट है। हालांकि अब यह कहने की जरूरत नहीं है कि अब उस टिफिन-सर्विस पर भाजपा खेमे के पत्रकारों ने कब्‍जा लिया है, जो सपा-सरकार में सतुआ-पिसान तक के संकट में घिरे रहते थे।
राजधानी के मोहनलालगंज में महिला की नंगी लाश के मामले में नंगी कुख्‍याति दर्ज है सिकेरा के खाते में। आपको याद होगा लखनऊ में मोहनलाल गंज इलाके के एक सरकारी स्‍कूल परिसर में मिली एक रक्‍तरंजित महिला की लाश, और उसके बाद पुलिस द्वारा की गयी सारी छीछालेदर। इस वक्‍त नवनीत सिकेरा लखनऊ के डीजाईजी थे। लेकिन खुद आगे बढ़ने के बजाय, सिकेरा ने महिला सुरक्षा प्रकोष्‍ठ के नाम पर बने एक समानान्‍तर विभाग की मुखिया और वरिष्‍ठतम महिला आईपीएस सुतापा सान्‍याल से बाकायदा झूठ बोलवा दिया। सुतापा को झांसा दिया गया कि उनका सम्‍मानित तबादला अपर पुलिस महानिदेशक महिला सुरक्षा प्रकोष्‍ठ के बजाय किसी दूसरे सकर्मक विभाग में एडजेस्‍ट कर दिया जाएगा। नतीजा यह हुआ कि सुतापा सान्‍याल ने किसी थाने के रीडर की तरह सरकारी प्रेस नोट बांचना शुरू कर दिया। और इसी बीच नवनीत सिकेरा ने इस पूरे मामले को एक अविश्‍वसनीय मोड़ देकर उसे हमेशा-हमेशा के लिए खत्‍म कर दिया। लेकिन हां, सुतापा सान्‍याल को उनका पारिश्रमिक कभी भी नहीं मिल पाया और वे जस की तस रिटायर हो गयीं। हां, उनके दामन पर इस कांड को झूठा मोड़ देकर उसे बर्बाद करने का अमिट कींचड़ जरूर हमेशा-हमेशा के लिए चस्‍पां हो गया।
नवनीत सिकेरा बहुत कारसाज हैं। सिकेरा पिछले लम्‍बे समय तक महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने वीमंस हेल्‍पलाइन 1090 के मुखिया बने रहे थे। बल्कि इस हेल्‍पलाइन का संस्‍थापक बनने के लिए नवनीत सिकेरा ने अखिलेश सरकार में सारा सरअंजाम तैयार किया था। लेकिन हकीकत यह है कि यह हेल्‍पलाइन नवनीत सिकेरा के प्रयासों से नहीं, बल्कि जोशीली और जहीन आईपीएस अफसर की सकारात्‍मक सोच का जमीनी प्रयास थी, जिसका नाम था अलंकृता सिंह। करीब 7-8 साल की नौकरी वाली आईपीएस अफसर अलंकृता सिंह ने ही इस योजना की रूपरेखा तैयार की थी, लेकिन इसके पहले कि वह उस पर कोई सटीक प्रयास कर सकती, वह योजना उसके हाथों से छीन ली गयी।
करीब पांच साल पहले अलंकृता सिंह सुल्‍तानपुर की पुलिस अधीक्षक थी। कप्‍तान के तौर पर उसकी यह पहली पोस्टिंग थी। नई-नई नौकरी थी, कर कुछ कर डालने का जज्‍बा था, और कुछ नया सोचने का माद्दा भी। इसी बीच अमेठी में अपने दौरे के दौरान अलंकृता सिंह को स्‍कूली लड़कियों के साथ हो रही अभद्र हरकतों की खबर मिली। उसने तत्‍काल मौके पर हस्‍तक्षेप किया।
इसी दौरान उसे लगा कि पुलिस द्वारा समाज में महिलाओं पर होने वाले अपराध, छेड़खानी और उत्‍पीड़न जैसे काण्‍डों पर प्रभावी हस्‍तक्षेप किया जाना चाहिए। इसलिए लिए उसने बाकायदा एक गम्‍भीर स्‍टडी शुरू की, कई समाजविज्ञानियों, शिक्षकों और पत्रकारों व समाजसेवियों से बातचीत की। इसके लिए पीडि़त महिलाओं से भी उनकी दिक्‍कतें समझने की कोशिश की। और आखिरकार सुल्‍तानपुर को ऐसी पीडि़त महिलाओं के समर्थन एक अभियान छेड़ दिया।
अलंकृता के इस प्रयास की टंकार लखनऊ तक पहुंची और एक दिन तब के महानिदेशक देवराज नागर ने अलंकृता को इस प्रोजेक्‍ट को समझने के लिए लखनऊ को बुलाया। उस समय लखनऊ के आईजी सुभाष समेत अनेक वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारियों को भी बुलाया। नागर ने अलंकृता के प्रयास के लिए उसकी पीठ ठोंकी। उसी बैठक में तय हो गया कि यह प्रोजेक्‍ट को मुख्‍यमंत्री की शान के तौर पर टांका जाएगा और अलंकृता को ही इस प्रोजेक्‍ट का जिम्‍मा दिया जाएगा।
लेकिन इसी बीच लैमारी और झपटमारी शुरू हो गयी। पुलिस के उच्‍चस्‍तरीय सूत्रों ने बताया कि उसके दो-चार दिनों बाद ही यह प्रोजेक्‍ट अलंकृता के बजाय नवनीत सिकेरा के हाथों थमा दिया गया। इटावा से सिकेरा की करीबी थी ही। सो, गोटी फिट हो गयी। और जो एक महिला होने के चलते प्रोजेक्‍ट अलंकृता सिंह को महिलाओं की पीडा को देख-समझ कर उसे निपटाने की पहलकदमी के नसर्गिक प्रयास के चलते दिया जाना चाहिए, उसे अब नवनीत सिकेरा की वर्दी में टांक दिया गया। सच बात तो यही है कि इस प्रोजेक्‍ट को अलंकृता सिंह ने ही सुल्‍तानपुर में पूरी सफलता के साथ शुरू किया था।

1 thought on “मामले खोलने नहीं, दफ्न करने में माहिर हैं नवनीत सिकेरा

  1. Bhai wah dulatti correspondent ko mera salam namaste.
    Bhai kya baat hai, bahut sundar laga badhai
    Kya likha hai sach me maza aa gaya
    Good sattire and your hmour mixed article Sir

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