आज ही तो खुला था हेमंत तिवारी की पिटाई का खाता

दोलत्ती

: ट्रिब्‍यून के संयुक्‍त संपादक डॉ उपेंद्र ने फोन कर पूछा, चोट बहुत दर्द कर रही है क्यों : बहुत काइयां है, लेकिन सच बात तो यही है कि उस हादसे में हेमंत तिवारी पूरी तरह निर्दोष था : ठीक 31 बरस पहले मैं, हेमंत तिवारी और राजू मिश्र बहराइच में बुरी तरह पीटे गये थे :
कुमार सौवीर
लखनऊ : क्यों चोट बहुत ज्‍यादा दर्द कर रही है ? यह सवाल उछाला था डॉ उपेंद्र ने डॉक्टर उपेंद्र ने। दैनिक ट्रिब्यून अखबार के नेशनल ब्यूरो चीफ रह चुके हैं डॉ उपेंद्र। अभी ठीक पौने बारह बजे उनका फोन आया। मुझसे बोले कि दिक्‍कत अभी भी है क्‍या। मैं चौक पड़ा। याद आ गया 31 साल पहले का वह हादसा जिसमें बहराइच के गुदड़ी मोहल्ले में हेमंत तिवारी, राजू मिश्रा और मैं खुद कुमार सौवीर को भीड़ ने पीट दिया था। सच बात यह है उस हादसे में सबसे ज्यादा चोट है तो राजू मिश्रा को ही आई थी लेकिन हेमंत तिवारी और मैं भी कई तमाचे खा गए थे। शायद लातें और घूसें भी। हां, उस हादसे में कार का ड्राइवर और हमारा एक जूनियर मोस्ट पत्रकार बिल्कुल बेदाग बच गया था, जिसका नाम था रमाशरण अवस्थी। हेमंत तिवारी आज मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति का अध्‍यक्ष है, राजू मिश्र दैनिक जागरण में ऊंचे ओहदे पर हैं, रमाशरण अवस्‍थी फैजाबाद के दैनिक जागरण का प्रमुख है। रही बात मेरी, तो मैं पिछले दस बरस से पत्रकारिता में दोलत्‍ती लगा रहा हूं। दोलत्‍ती डॉट कॉम के माध्‍यम से।
खैर, आइये हम आपको ले चलते हैं उस घटना की ओर जहां कई घटनाएं एकसाथ गड्डमड्ढ हो गयीं। रात करीब पौने बारह बजे का वक्त था। दिवस था 20 मई और सन 19 89 की रात। उपेंद्र की शादी का मौका था। उपेंद्र उस वक्‍त नया-नवेला पत्रकार बना था। आईआईएमसी से डायरेक्‍ट दैनिक जागरण में शामिल हुआ था, और उसका सीनियर मैं था।

बरात फैजाबाद से बहराइच जाने वाली थी। चूंकि उपेंद्र उस समय बहुत जूनियर पद पर था इसलिए बाकी लोगों ने उसकी शादी में शामिल करने की जरूरत ही नहीं समझी। लेकिन मैं के अलावा हेमंत तिवारी, राजू मिश्रा और रमाशरण शादी में शामिल होने को तैयार हो गया। हेमंत ने बताया कि रात के वक्त शायद बस में लेट-लपेट हो सकती है, इसलिए बेहतर होगा कि हम एक किराये पर एक टैक्सी ले लें। कुछ किराया ज्यादा हो जाएगा लेकिन समय से हम लोग समय से पहुंच तो जाएंगे न। दूरी थी करीब सवा सौ किलोमीटर दूर बहराइच में। आराम से उपेंद्र की शादी में शामिल हो सकेंगे हम लोग।

हेमंत ने बताया कि उसके पास एक टैक्सी वाला है जो रात में बहराइच चलने को तैयार है लेकिन इसके लिए प्रति यात्री 60 रूपये का किराया भुगतान करना पड़ेगा। मरता क्या न करता। हम लोग राजी हो गए। हां, यह तय हुआ कि किराया हम लोग अपनी जेब से देंगे। यानी मैं, कुमार सौवीर और राजू मिश्र। यह तीनो लोग 75-75 रुपए का भुगतान करेंगे। किराये का भार रमाशरण अवस्‍थी नहीं उठायेगा।
समय से टैक्सी हजरतगंज कोतवाली के ठीक सामने वाले दैनिक जागरण कार्यालय के नीचे आ गयी। हम लोग कार में लद गये। बायीं ओर हेमंत तिवारी, बीच में रमाशरण अवस्‍थी, दाहिनी ओर पर मैं, जबकि आगे की बायीं सीट पर राजू मिश्र ने अपनी आसन जमाया। गाड़ी आगे बढ गयी, तो रास्ते में हेमंत तिवारी ने दारू की बोतल निकाली, तो हम लोग चौक पड़े। सवाल उछाला कि क्या अकेले-अकेले गटकोगे हेमंत? हेमंत तिवारी ने हंस कर जवाब दिया कि यह पैसा मैंने अपनी जेब से खर्च किया है, इसलिए जिसे भी शराब चाहिए वह उसके लिए अतिरिक्त भुगतान करे।
सच बात तो यही है कि शादी-ब्‍याह में जब आप खाली सफर कर रहे हों, और आपको हल्‍का-फुल्‍का सुरूर चाहिए, शराब की दूकान बंद हो चुकी हो, और उस वक्‍त शराब की ललक अचानक भड़क जाए, तो इंसान में तलब के कीड़े कुलबुलाने लगते हैं।
मैं और राजू मिश्रा इस भुगतान के लिए तैयार हो गए। प्रति व्‍यक्ति 50 फी-क्‍वार्टर। अल्‍लाह न जाने कितनी दारू रखे था हेमंत तिवारी। हमने भुगतान किया। हालांकि यह बड़ी रकम थी लेकिन अकेला आदमी शराब पी रहा हो तो दूसरा चुपचाप कैसे बैठा है। मैं भी बस एक-डेढ़ पैग तक की सीमित था। जबकि राजू और हेमंत टैंकर। मैंने अपने क्‍वार्टर में बची शराब भी राजू मिश्र को समर्पित कर दी। पहले शायरी और शेर, फिर गीत और उसके बाद हुडदंग। सब कुछ परम्‍परागत ढंग से ही होने लगा।
रास्ते में ड्राइवर ने न जाने किस संदर्भ में बता दिया कि वह टैक्सी ड्राइवर नहीं है बल्कि वन विभाग का कर्मचारी है और यह गाड़ी भी वन विभाग की ही है, जिसे अफसर ने भेजी है। कहने की जरूरत नहीं कि हेमंत तिवारी ने हम सब से झूठ बोला था और वन विभाग के कार को टैक्सी बताते हुए हमसे सवा दो सौ रूपये वसूल लिए थे। दारू वाला रुपए अलग से। बहरहाल, हम सब ने हेमंत तिवारी की लानत मलामत करनी शुरू कर दी। कार अपनी रफ्तार पर आगे बढ़ने लगी थी। तब तक राजू मिश्रा बुरी तरह टल्ली हो चुके थे। और हम बाराबंकी से आगे घाघरा नदी के घाट की राह पर थे।
अचानक एक रेलवे क्रॉसिंग पर हेमंत तिवारी ने कार को रोकने के लिए हल्‍ला मचाना शुरू कर दिया। दरअसल, उस वक्‍त सड़क पर एक नया पिंक कलर का सफारी सूट पहने व्यक्ति साइकिल से गुजर रहा था। हेमंत तिवारी उस व्‍यक्ति से बहराइच का रास्‍ता पूछना चाहता था। उस समय राजू मिश्र के मुंह में पान की पीक भरी हुई थी। तब राजू मिश्र का मुंह हमेशा पीक से भरा ही होता था। बाद में पता चला कि यह महादेव धाम की रेलवे क्रासिंग की घटना थी।
आपको बता दूं कि आज से 31 साल पहले सफारी सूट आम कस्बाई लोगों की हैसियत से बाहर की बात हुआ करता था। संभवत: वह व्‍यक्ति किसी शादी में शामिल होने या वहां से लौट रहा था। इसके पहले कि मैं जान पाता, हेमंत तिवारी ने उससे बहराइच का रास्‍ता पूछा। इसके पहले कि वह साइकिल रोककर अपना बायां पैर जमीन पर टिका कर सायकिल पर अपना बैलेंस बना कर रास्‍ता बताता, राजू मिश्रा ने उस व्‍यक्ति के सूट पर थूक मारा।
इस अचानक हमले से अचकचाया वह आदमी साइकिल से गिरा और एक नीचे छोटे गड्ढे मैदान में धड़ाम होने लगे। हम सब भयभीत कि हादसा आखिर क्यों हो गया। राजू पर गुस्सा आया और अपने पर घृणा। हेमंत ने ड्राइवर से घबरा कर कहा कि अब फौरन निकल लो। तेज भागो। ड्राइवर ने कार को तेज एक्‍सीलेटर पर छोड़ दिया। कार फर्राटा भरते हुए चलने लगी। सिवाय इसके कि हम सब अपने इस अपराध पर शर्मिदा होते रहे और राजू मिश्रा की हरकत पर लानत भेजते रहे। करीब 1 घंटे बाद हमारी गाड़ी बहराइच के पीपल चौराहा पर पहुंची। एक से रास्ता पूछा तो उसने बाई तरफ वाली सड़क का इशारा किया।
करीब 100 मीटर अंदर जाने पर कुछ भीड़ सी लगी थी। पता चला किसी मीटिंग से लोग निकल रहे थे। अधिकांश लोगों के पास साइकिलें थीं, कुछेक लोग स्कूटर मोटरसाइकिल पर भी थे। बाद में पता चला कि वहां आरएसएस का दफ्तर था जहां किसी विशेष प्रयोजन पर वार्तालाप के लिए लोगों को बुलाया गया था। लेकिन हम को क्या पता।
लेकिन तब तक राजू मिश्रा बुरी तरह से टल्‍ली हो चुके थे। ड्राइवर ने कुछ एक बार हॉर्न बजाया ताकि भीड़ छंट जाए और कार को रास्ता मिल जाए। लेकिन इसमें थोड़ा समय लग रहा था, जो राजू मिश्रा बर्दाश्त नहीं कर पाए। राजू ने नशे के जोर में भीड़ लगाए लोगों को मां-बहन की गालियां देना शुरू कर दिया। फिर क्या था। जैसे किसी ने ततैया के छत्‍ते पर ढेला मार दिया हो। वहां मौजूद लोग राजू मिश्रा पर टूट पड़े। दरवाजा खींचकर राजू की कुटुम्‍मस शुरू हो गयी। यह देख कर मैं राजू मिश्रा को बचाने के लिए कार से बाहर निकला और लोगों को रोकना शुरू किया। इसी बीच हेमंत तिवारी भी कार से बाहर निकला लेकिन इसके पहले कि हम लोग उस भीड़ को समझा पाते, भीड़ हम पर हमलावर हो गई। राजू मिश्र की कुटाई तो चल ही रही थी, कुछ लोग हमारी ओर भी दौड़े। मौसम खराब देख कर हेमंत कार के पीछे भागा लेकिन भीड़ ने पहले मुझे दबोच लिया। कई थप्पड़ और घूंसे तो मुझ पर भी रसीद हो गए। फिर पीटी उषा को मात देते हेमंत तिवारी को भी भीड़ ने लपक कर पकड़ा था और उनकी भी कुटम्‍मस शुरू हो गई थी। एक थप्‍पड़ में दाहिनी ओर, जबकि दूसरे घूंसे पर बायीं ओर मुड़ते ही रहे हेमंत तिवारी। निरंतर।

मगर राजू मिश्रा की हालत तो बॉक्सिंग पैड जैसी हो गयी। जबकि रमाशरण अवस्‍थी बुरी तरह डरा हुआ था और वह कार के सीट के भीतर ही दुबक गया था। यही हालत उस ड्राइवर की भी थी लेकिन तब तक उस भीड़ से कुछ लोगों ने बीच-बचाव किया और हमें बचाया।
हम सीधे उपेंद्र की शादी पर पहुंचे। उपेंद्र शादी के फेरे ले रहा था। वहां मौजूद लोग हमारी हालत देख कर परेशान थे लेकिन शराब की महक पर प्रतिक्रिया वहां मौजूद हर शख्स के चेहरे पर साफ दिख रही थी। वक्त काफी बीत चुका था और हम में गुस्‍सा भी खूब भरा हुआ था, इसलिए हमने भोजन तो नहीं किया लेकिन तय कर दिया कि अब यहां ज्यादा देर तक रहना उचित नहीं है। हम वापस लौटे। लौटते वक्‍त बीच में हेमंत तिवारी ने कहा कि चलो एसपी से मिलते हैं और उन हमलावरों पर औकात में लाकर खड़ा करेंगे।
हम सब एसपी बंगले पर पहुंचे। हेमंत की आवाज तो काफी थी लेकिन सबसे ज्यादा नशा राजू मिश्रा पर ही था। राजू लगातार हर एक सांस पर गाली बक रहा था। हां हां कप्तान को भी। अचानक कप्तान बंगले के भीतर हलचल मची। पता चला कि कप्तान आ रहे हैं। एसपी ने अपने दफ्तर में हमें बिठाया और माजरा पूछा। हम लोगों ने पूरा ब्‍योरा उस भीड़ के खिलाफ बताया। इस पर कप्तान की प्रक्रिया थी कि आप पहले तो अपनी स्थिति का भी आकलन कर दें और फिर खुद तय करें कि वह हादसा क्यों हुआ। लेकिन इसके बावजूद अगर आपको लगता है कि आपके साथ अन्याय हुआ है तो जाइए कोतवाली में।आप की रिपोर्ट दर्ज हो जाएगी। मैं अभी कोतवाल को फोन कर देता हूं।
हम सब कोतवाली पहुंचे। हेमंत तिवारी ने रिपोर्ट लिखी, उसकी कॉपी लेकर हेमंत ने उसे तह लगा कर अपनी जेब में रखा। और वापस चले आए लखनऊ। इतनी बेइज्‍जती के बाद और क्‍या कर भी सकते थे हम लोग। सब से ज्‍यादा गुस्‍सा तो मुझे राजू मिश्र पर आ रहा था। दूसरा गुस्‍सा हेमंत तिवारी पर, जिसने टैक्‍सी के नाम पर हम से मोटी रकम उगाह ली और दारू की एवज में भी रूपया ऐंठ लिया। और तीसरा गुस्‍सा खुद पर भी आ रहा था कि आखिर मैं इस जंजाल में कैसे फंस गया। यह भी नाराजगी थी कि रमाशरण अवस्‍थी के नवेले बच्‍चे के सामने हमने अपनी नाक कटवा ली।
घटना को एक हफ्ता बीत गया। हमारा अपराध बोध समाप्त हो गया था। खैर, उस घटना के प्रति आक्रोश खत्म हो गया था और हम सब को लगी चोटों का दर्द-अहसास भी लगभग खत्म हो चुका था। हेमंत तिवारी तो पहले ही दिन सुबह की मीटिंग में ही सहज दिखने लगा। जबकि राजू मिश्र को दो-तीन लग गया।
एक शाम करीब पांच बजे एक दरोगा आया और उसने पूछा कि हेमंत तिवारी कौन हैं ?
लोगों ने इशारे से हेमंत की ओर उंगली दिखायी।
दरोगा ने पूछा आप हेमंत तिवारी हैं ?
हेमंत बोले :- क्यों, क्‍या मामला है ?
दारोगा ने कहा कि आपने बहराइच में एफआईआर दर्ज कराई थी मारपीट की। एक हफ्ता पहले।
हेमंत तिवारी कुछ देर सोचा। फिर पूछा कि यह एफआईआर किसने दर्ज कराई थी ?
आपने। आप ही तो हेमं‍त तिवारी है न ? दारोगा ने पूछा।
हेमंत तिवारी का जवाब था:- नहीं। मैं हेमंत तिवारी नहीं हूं।
तो वह कहां मिलेंगे ?
मुझे क्‍या पता।
और राजू मिश्रा कौन है ?
हेमंत तिवारी ने राजू मिश्रा की ओर इशारा किया। लेकिन तब तक राजू मिश्रा को इलहाम हो गया था कि कुछ मामला गड़बड़ होने वाला है। और वह मामला बहराइच के हादसे को लेकर है। लेकिन इसके पहले कि वह दारोगा उसके पास आता, राजू मिश्रा लपक कर दफ्तर के बाहर चले गए। जाहिर है कि उसे राजू मिश्रा नहीं ही मिले।

फिर उसने मेरा नाम पूछा। मैंने कहा कि हां, मैं हूं कुमार सौवीर।
दरोगा ने मुझसे कहा कि लेकिन बाकी लोग तो अपना नाम सुनते ही भाग निकले हैं।
मैंने उसे कहा कि जिस हालात में वो एफआईआर दर्ज हुई थी उसको अब भूल जाइए। अब न उस पर बयान देने हेमंत जाएंगे और ना ही राजू मिश्रा। तो बेहतर यही होगा कि आप इस पूरे मामले को यही पर खत्म कर दें।
मुझे याद है उस वक्त कैसा चेहरा हो गया था उस दारोगा का। यकीनन उस यकीन नहीं आया होगा कि खुद को बहुत बड़ा पत्रकार कहलाने वाले लोग इस तरह भी पाला बदल कर सकते हैं। मेरे उस दारोगा को अपने साथ उसकी बांह पकड़ी और बाहर चाय पिलाते हुए कि आप जब भी कहेंगे जहां भी कहेंगे मैं मौजूद हो जाऊंगा। लेकिन बाकी लोगों का ठेका कैसे लिया जा सकता है ? जो कुछ भी आपको दिक्कत हुई है उसके लिए मैं शर्मिंदा हूं और माफी चाहता हूं।
वह दारोगा कुछ देर तो वहीं खड़ा रहा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके साथ यह क्‍या हो रहा है।
उसके बाद और कुछ तो ज्यादा तो नहीं हुआ। सिवाय इसके कि राजू मिश्रा पर संपादक विनोद शुक्‍ला उर्फ भइया का रोष, आक्रोश, प्रकोप के तौर पर मार-पिटाई के तौर पर बढ़ गया। दूसरी ओर हेमंत तिवारी का खाता पिटाई के क्षेत्र में नया दर्ज हो गया।
और मैंने संकल्प ले लिया कि अब शराब केवल समझदार और विश्‍वसनीय साथियों के साथ ही पिया करूंगा। भले दो-चार बरस तक न पियूंगा।
नहीं, उपेंद्र! मैं अब काफी ठीक हूं। उस घटना जब भी जेहन में गूंजती है, मैं दिल दहल जाता है। दर्द तो खैर कुछ ही दिनों में खत्‍म हो गया था। लेकिन मेरे संकल्‍प ने मुझे बहुत बेहतर जीवन व्‍यतीत करने में बेइंतिहा मदद की।

गलतियां किससे नहीं होती हैं? दरअसल, वह दौर ही दूसरा था। राजू मिश्र एक खुरपेंची शख्‍स माने जाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि राजू एक जहीन और बेहतर इंसान है। ठीक यही हालत हेमंत तिवारी की है। अपनी राजनीति के चलते उसने कई धत-कर्म भी किये हैं, घिनौने भी। लेकिन कम से इस घटना में तो हेमंत का कोई दोष नहीं था।

जो भी हुआ, वह संजोग ही था।

हां, डॉक्‍टर उपेंद्र पांडेय हमेशा से ही कमीना ही था, कमीना ही है ओर कमीना भी रहेगा।
इंशाअल्‍लाह।

आखिर उसको क्‍या जरूरत थी कि वह आधी रात को मुझे जगाये, कुरेदे और मुझे हेमंत तिवारी और राजू मिश्र के बारे में लिखवा कर मुझसे उनकी दुश्‍मनी कराये?
आखिर मेंं मैं  इतना जरूर कहूंगा कि दैनिक जागरण की नौकरी के दौरान में मैंने रमाशरण अवस्‍थी जैसा कोई दूसरा दूध का धुला शख्‍स नहीं देखा। एक मासूम बच्‍चा। बेदाग इंसान।

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