चुंगुल में फंस ही गया जंगल का माफिया

दोलत्ती

: फॉरेस्‍ट विभाग में यादव सिंह जैसी छवि है श्रीधर त्रिपाठी की : अकूत सम्‍पत्ति जुटा ली थी इस अदने से जंगलात के मुलाजिम ने : वन विभाग को बुरी तरह चर गया जंगल का यह लकड़बग्‍घा : 
कुमार सौवीर
लखनऊ : शेर और बाघ तो जंगल का बादशाह माना जाता है। जबकि तेंदुआ, चीता जैसे प्राणी जंगल की सीमाओं पर किसी छोटे-मोटे जमींदारों की तरह हैसियत रखते हैं। लेकिन यूपी के जंगलात महकमे में बन-कूकुर और लकड़बग्‍घा जैसे लोगों ने इन बादशाहों और जमींदारों की हैसियत को ही चबा डाला है। इन लकड़बग्‍घों ने पूरे जंगल को कुछ इस तरह लूटा और चबाया है, कि पूरा जंगल ही सहम गया। फिलहाल इनमें ऐसे लकड़बग्‍घों और बन-कूकुरों में सिर-मौर की पूंछ अब सरकारी शिकंजे में बुरी तरह फंस गयी है।
इस लकड़बग्‍घे का नाम है श्रीधर त्रिपाठी। बेहद अदना-सा कर्मचारी है श्रीधर त्रिपाठी, लेकिन अपनी नौकरी में उसने जो गुल खिलाये हैं, वे अभूतपूर्व हैं। यही वजह है कि फॉरेस्‍ट विभाग में श्रीधर की कुख्‍याति यादव सिंह से कई गुना ज्‍यादा बतायी जाती है। बताते हैं कि श्रीधर ने जो-जो कुल-धतकरम किये हैं, उसकी लिस्‍ट ही बेहिसाब है। सूत्र बताते हैं कि श्रीधर त्रिपाठी ने तो जंगल को ही चर डाला था। लेकिन फिलहाल तो उसकी पूंछ सरकार की ओर से बिछाये गये शिकंजे में बुरी तरह फंस गयी है। और सूत्र बताते हैं कि अब इस पूंछ को निकाल पाना श्रीधर के लिए काफी मुश्किल होगा।
दोलत्‍ती इस पूरे प्रकरण को धारावाहिक तौर पर प्रकाशित करने जा रहा है। मिली खबरों के मुताबिक श्रीधर त्रिपाठी की ऐसी कारस्‍तानियों में वन विभाग के आला अफसर और शासन में बैठे अफसरों के साथ ही साथ बड़े नेताओं की भी खासी संलिप्‍तता रही है। सरकारी कोष और योजनाओं के लिए जारी किये गये धन को जिस तरह श्रीधर ने लूटा है, वह जंगल महकमे में बेमिसाल बताया जाता है। दोलत्‍ती सूत्र बताते हैं कि अपनी संवर्गीय सेवा की राजनीति में काफी मजबूत हैसियत रखने वाले श्रीधर त्रिपाठी ने आला अफसरों की पोस्टिंग-ट्रांसफर में भी खासा दखल रखा था और उसमें होने वाली मोटी रकम पर बंदर-बांट की है। यूनियन में दखल रखने वाले श्रीधर त्रिपाठी ने अपनी करतूतों की गोटियां बिछाने के लिए पत्रकारों की भी एक मजबूत और बड़ी लॉबी तैयार रखी थी।
दोलत्‍ती सूत्रों ने बताया कि प्रादेशिक वन सेवा में रहने के बावजूद श्रीधर को प्रभागीय वन अधिकारी का पद दे दिया गया था। बताते हैं कि इसके लिए श्रीधर त्रिपाठी ने सम्‍बन्धित अधिकारियों को पचास लाख रूपयों का भुगतान किया था, ताकि उसकी यह नियुक्ति पर कोई तकनीकी समस्‍या न आये। अपने इसी जुगाड़ के चलते ही अपात्र होने के बावजूद श्रीधर त्रिपाठी को अलीगढ़ में पोस्टिंग मिल गयी थी। इस पोस्टिंग पर काफी असंतोष फैला था, लेकिन ऊंची पहुंच के चलते श्रीधर त्रिपाठी ऐसे विभागीय असंतोषों को लगातार कुचलते हुए बड़ी रफ्तर के साथ आगे बढ़ता ही रहा। लेकिन अचानक….(क्रमश:)

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