यह हैं अंग्रेजी के पत्रकार, इनको मारो जूते चार

दोलत्ती

: साहित्‍यकार गिरिराज किशोर की मौत पर टाइम्‍स आफ इंडिया ने छाप दी हिन्‍दूवादी आचार्य गिरिराज की फोटो : पांच बरस पहले ही मर चुके हैं आचार्य गिरिराज किशोर : पत्रकारिता की लुटिया डुबो दिया अंग्रेजी पत्रकारों ने :
कुमार सौवीर
लखनऊ : इन पत्रकारों को इतनी भी तमीज नहीं है कि कौन महात्मा गांधी पर लिखने वाला मशहूर पद्मश्री साहित्यकार है, और कौन सांप्रदायिकता का झंडाबरदार। खुद को मुल्क का सबसे बड़ा अंग्रेजी अखबार साबित करने की होड़ वाले टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार को देखिये तो तनिक, अरे क्या छाप दिया इस अखबार ने। कहां गांधीजी यानी पहला गिरमिटिया लिखने वाला साहित्यकार गिरिराज किशोर और कहां गोडसे को मारने वाले सम्‍प्रदाय के पैरवी करने वाले कट्टर हिंदूवादी नेता आचार्य गिरिराज किशोर। इस अखबार ने पद्मश्री गिरिराज किशोर की जगह आचार्य गिरिराज किशोर की फोटो बेधड़क छाप डाली है।
यह कोई अनोखा वाकया नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया इसके पहले भी ऐसी कई भयावह गलतियां और अक्षम्‍य अपराध कर चुका है। लेकिन इस अखबार के आज के अंक में जो छापा है इस अखबार ने, वह पत्रकारिता जगत में अब हमेशा काला अध्याय के तौर पर ही दर्ज किया जाएगा। इस अखबार ने एक साहित्यकार गिरिराज किशोर के देहांत की खबर पर उनकी फोटो के बजाय विश्व हिंदू परिषद एक हिंदूवादी की फोटो छाप दी है, जो 5 साल पहले मर चुके थे।
तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार। यह नारा सामाजिक संरचना को लेकर यूं ही नहीं बनाया गया था, बल्कि ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया समुदाय को अपमानित करने के लिए यह नारा बहुजन समाज पार्टी की अध्‍यक्ष मायावती ने अपने संगठन की शुरूआत में यह नारा बुना था। लेकिन आज मायावती का यही नारा आज की पत्रकारिता पर बिल्कुल सटीक फिट हो रहा है। वह भी खासतौर पर अंग्रेजी पत्रकारिता पर। खुद को बहुत जिम्मेदार और गंभीर तथा एलीट क्लास की आवाज बनने का दावा करने वाले अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज जो करतूत की है उससे तो यह मायावती का नारा बिल्कुल मौजूं साबित हो गया है। ताजा नारा है कि:- अंग्रेजी के पत्रकार, इनको मारो जूते चार।
आपको बता दें कि महात्मा गांधी की को लेकर लिखा गया मशहूर उपन्यास था पहला गिरमिटिया। इस किताब के लेखक थे बड़े साहित्यकार गिरिराज किशोर। कल यानी रविवार नौ फरवरी को गिरिराज किशोर की मृत्यु हो गई। सभी सोशल मीडिया गिरिराज किशोर की मृत्यु की खबरें खूब छापीं, और उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की गईं। इन श्रद्धांजलि में उनकी मृत्यु की खबर के साथ ही साथ उनकी फोटो भी खूब छापी गई। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस पूरी मौत को इस महान साहित्यकार की मृत्यु को मजाक बना डाला। आज सोमवार 10 फरवरी के अंक में जो खबर छपी है वह इसी घटिया पत्रकारिता का नमूना है। पहले पन्ने में छपी खबर में गिरिराज किशोर जी की खबर तो है लेकिन उस खबर के साथ जो फोटो लगाई गई है वह साहित्यकार गिरिराज किशोर जी की नहीं, बल्कि विश्व हिंदू परिषद के दिग्गज हिंदूवादी नेता आचार्य गिरिराज किशोर की फोटो है। हालांकि यह खबर एडिशन में छप गई मगर लखनऊ सिटी एडिशन में उसे सुधार दिया गया। लेकिन जितनी भी छीछालेदर टाइम्स ऑफ इंडिया की हो चुकी है उसे सुधार पाना मुमकिन नहीं।
बनारस के पत्रकार प्रेमप्रकाश ने इन अंग्रेजीदां अखबारों और उनके रिपोर्टर्स की ठसक पर तीखा प्रहार किया है। उन्‍होंने लिखा है कि:- ये टाइम्स ऑफ इंडिया की कतरन है। आज सुबह के सभी अखबारों ने आदरणीय गिरिराज किशोर के निधन की खबर के साथ उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी है। हिंदी, हिंदी का लेखक और हिंदी का पाठक अंग्रेजी में सोचने वालों की नज़र में क्या हैसियत रखता है, ये कतरन उसकी एक बानगी है। साहित्य अकादमी और पद्मश्री सम्मान से विभूषित गिरिराज जी का समूचा लेखन उद्देश्यपूर्ण और शोधपूर्ण लेखन है। अप्रामाणिक सूचनाएं उनके लेखन का हिस्सा कभी नही बनीं। ऐसी प्रामाणिक कलम के धनी, ‘पहला गिरमिटिया’ सहित दर्जनों उपन्यासों के रचयिता, कई कहानी संग्रहों और सैकड़ों वैचारिक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक निबंधों के लेखक गिरिराज जी को श्रद्धांजलि देते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया वालों ने तस्वीर विश्व हिंदू परिषद वाले गिरिराज जी की लगायी है। उन्होंने शायद कभी स्वर्गीय गिरिराज जी का चेहरा नहीं देखा। अंग्रेजी वालों को जरूरत भी क्या है हिंदी वालों को पहचानने की। तिसपर एक ऐसा लेखक, जो गांधी के संघर्षों पर लिखने के लिए ज़िन्दगी भर देशी विदेशी गलियों की खाक उड़ाता फिरा हो। लानत भेजिए इस अखबार को, जिसने एक गांधी वाले के निधन की खबर पर एक गोडसे वाले की तस्वीर लगाई है। लानत इसलिए कि एक ऐसे वक़्त में, जब गांधी के आभामंडल पर गोडसे का अंधेरा गहन करने की कुत्सित कोशिशें थमने का नाम नहीं ले रही हैं, तब हम ऐसी पत्रकारिता को अनजाने में हुई किसी भूल की नहीं, जानबूझकर किये गए अपराध की श्रेणी में रखने को बाध्य हैं। लेखक गिरिराज जी की स्मृतियों को हम सादर नमन करते हैं।

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