मैजिस्‍ट्रेट ने की एजे से जिला जज की शिकायत

दोलत्ती

: पूरे खानदान को बिना टिकट यात्रा कराते हैं जिला जज : जस्टिस बीएम लाल को लोग बम-लाल कहते थे : एक जज की आत्‍मकथा- चार :
राजेंद्र सिंह
बांदा: (गतांक से आगे) बाँदा में एक शाही जी वरिष्ठतम मुंसिफ थे जो सुपरसीड थे और कहते थे कि भंवर सिंह के बैच मेट थे । जज साहब से दबते नहीं थे और मीटिंग में उनका खुल कर प्रतिवाद करते थे । उनका ट्रांसफर हो गया।उनकी विदाई पार्टी की संभावना नहीं बन रही थी । हम लोगों ने 10, 10 रुपये चंदा कर चाय पार्टी की । जज साहब ने 10 रुपये भी नहीं दिए ।
समय बड़ा बलवान । कानपुर के ए0जे0 जस्टिस बी0एम0लाल हो गए ।सख्त और दबंग । इनको सख्ती के कारण बम लाल भी कहते थे लोग ।बाँदा का वार्षिक निरीक्षण के कार्यक्रम आया ।मैं ए0जे0 को लेने मानिकपुर गया । कुतुब से रात बाँदा आये । निरीक्षण समाप्त होने के बाद उनको छोड़ने मुझे जाना था । उन्होंने एच0ओ0आर0 दिया । चम्बल एक्सप्रेस में उस दिन ए0सी0 कोच नहीं लगा । तथ्री टियर का का टिकट बनवा दिया मैंने । सब कह रहे थे कि रहने दो , क्या जरूरत है टिकट की । बोगी खाली थी ।मैं उनसे थोड़ी दूर दूसरे केबिन में चला गया ।मानिकपुर में उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और पूछा गया कि सब ठीक है । मैं बोला … नहीं ।मेरा टी0ए0 बिल एक साल से रोका हुआ है । वे बोले इलाहाबाद में रुकने का क्या है । मैंने बताया कि पापा का घर है । उन्होंने पापा के बारे में सब पूछा और अगले दिन सुबह 7 बजे बुलाया मुझे अपने घर ।
मैं अगले दिन सुबह 7 बजे पहुंच गया । मुझे अपने बेडरूम में बुलाया ।चाय पी रहे थे मुझे भी चाय दी । मेरा और उनका वार्तालाप.
जेबीएमल….बाँदा में सब ठीक है ।
मैं…..नहीं सर, जज साहब मुझसे आशा करते हैं कि मैं उनको व उनके बच्चों को लेने या छोड़ने जाऊं और मैंने जब मन किया तो मुझे तरह तरह से तंग करने लगे । मेरा टी0ए0बिल का भुगतान एक साल हो गया नहीं किया है ।
जेबीएमल…. तुम्हारे जज साहब और उनके संबंधी टिकट लेकर यात्रा करते हैं।
मैं……जी नहीं सर ।
जेबीएमल …..तब कैसे होता है ?
मैं……सर , बाँदा में रेलवे मजिस्ट्रेट कोर्ट की तीन बेल्ट बहुत पहले से बनी है । एक बेल्ट जज साहब के पास है । अपने चपरासी को पहना कर रेलवे मजिस्ट्रेट के चपरासी के रुप में प्रस्तुत करते हैं ।
जज साहब ने कहा कि तुम अपने जज साहब से कह कर अपने सारे टी0ए0 बिल्स मेंरेे पास भिजवा देना , मैं आर्डर कर दूंगा ।फिर बोले अपने जज साहब को कल मेरे पास भेज देना । मैंने कहा सर इन्हें हमसे बुलाने को न कहें ।वे समझ गए बोले ठीक है तुम जाओ और अपना काम ईमानदारी से करते रहो ।तुम्हारे बारे मुझे सब जानकारी है । मैं गद गद होकर बाँदा लौट आया । बाँदा में गुप्ताजी जज साहब ने बुलाकर पूछताछ की ।मैंने कहा दिया कि मेरे सारे टी0ए0 बिल्स उन्होंने मंगाए हैं ।इसके दो दिन बाद मेरे टी0ए0 बिल्स पास हो गए और लगभग 5 हज़ार रुपये मिले । जय हो लाल साहेब । जज साहब इलाहाबाद गए । ए0जे0 साहेब उनसे लंच टाइम में नहीं मिले और शाम को खड़े खड़े दो मिनट में रुखसत किया , ये जानकारी उनके साथ के स्टाफ ने मुझे दिया था ।जज साहब ने बाँदा में लौटकर अपने घर में कुछ अधिकारियों के समक्ष कहा कि राजेन्द्र सिंह क्या समझते हैं कि मुझे फूंक मार कर उड़ा देंगे । मुझे ये सुनकर बड़ा अजीबोगरीब सा लगा था ।
मैं अपने काम में बड़ी शिद्दत से लगा था। दिसम्बर जाड़े की कड़कड़ाती ठण्ड वाली रात में लगातार प्लेटफार्म मानिकपुर में खड़े होकर इलाहाबाद बॉम्बे up व down ट्रेन्स को रूकवाकर चेकिंग कर रहा था । कंट्रोल रूम से फ़ोन आ रहे थे कि जिन ट्रेन्स का ठहराव मानिकपुर नहीं है उन्हें क्यों रोक रहे हैं। मैन कहलवाया की कह दो सरकारी कार्य मे बाधा न डाले नहीं तो यही पर एफ0आई0आर0 लिखवा दूंगा । गोमा की जैकेट पहनने के बावजूद ठंड के मारे पूरा शरीर vibrator मोड में था । दांत किटकिटा रहे थे ।चाय पर चाय पी रहे थे लेकिन आराम नहीं मिला ।सुबह 7 बजे मानिकपुर कैम्प कोर्ट में आकर कंबल ओढ़कर लेटे तब थोड़ा आराम मिला । उस रात 70 के लगभग बिना टिकट यात्री पकड़े गए । बाँदा लेकर ट्रायल किया । बाँदा को 0 केटेगरी में रखा गया था रेलवे द्वारा । यहां के काम को देखकर झांसी सीनियर डी0सी0एस , डी0आर0एम आये और काफी सुविधाएं दी गईं ।कूलर पहली बार चैम्बर में लगा । (क्रमश:)

राजेंद्र सिंह यूपी के उच्‍च न्‍यायिक सेवा के वरिष्‍ठ न्‍यायाधीश रह चुके हैं। वे लखनऊ हाईकोर्ट के महानिबंधक और लखनऊ के जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश समेत कई जिलों में प्रमुख पदों पर काम कर चुके हैं। हालांकि अपने दायित्‍वों और अपनी जुनूनी सेवा के दौरान उन्‍हें कई बार वरिष्‍ठ अधिकारियों का कोपभाजन भी बनना पड़ा। इतना ही नहीं, राजेंद्र सिंह को इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रोन्‍नत करने के लिए कोलोजियम में क्लियरेंस भी दी गयी थी। लेकिन विभागीय तानाबाना उनके खिलाफ चला गया। और वे हाईकोर्ट के जज नहीं बन पाये। अपने साथ हुए ऐसे व्‍यवहार से राजेंद्र सिंह का गुस्‍सा अब आत्‍मकथा लिखने के तौर पर फूट पड़ा। उनके इस लेखन को हम धारावाहिक रूप से प्रकाशित करने जा रहे हैं। उनकी इस आत्‍मकथा के आगामी अंक पढ़ने के लिए कृपया क्लिक कीजिए:-
एक जज की आत्‍मकथा

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