महान थी “धरपेल”, शोक-संवेदनाओं का तांता

दोलत्ती

: जोखू प्रसाद तिवारी के निधन पर शोक-संतप्‍त हो गया पत्रकार राजनीति-जगत : ऐसी करतूतों से ही हेराल्‍ड समूह तबाह हुआ :
कुमार सौवीर
लखनऊ : 64 पेजी ‘धरपेल’ पत्रिका के संपादक जोखूप्रसाद तिवारी के निधन से राजधानी का पत्रकारिता और राजनीतिक-जगत जैसे सन्निपात में है। सकते में है, बेहाल है और विधवा-विलाप कर रहा है। जगह-जगह शोक-संवेदनाओं का तांता लगा हुआ है। प्रेस-क्‍लब से लेकर मुख्‍यमंत्री कार्यालय तक में शोक की लहर फैल गयी है। पत्रकारिता, राजनीति और नौकरशाही के बड़ी हस्तियों की ओर से अश्रुपूरित नयनों से कहा-माना जा रहा है कि हास्‍य और व्‍यंग्‍य की विधा की पुनीत धारा प्रवाहित करने का जो भागीरथी-प्रयास और संकल्‍प जोखूप्रसाद तिवारी ने उठाया था, वह अद्भुत है। और आवश्‍यकता इस बात की है कि युवा पत्रकारों में उनके द्वारा प्रणेत हास्‍य-व्‍यंग्‍य से अवगत कराया जाए।
आपको बता दें कि जोखू प्रसाद तिवारी उप्र प्रेस क्‍लब के सचिव थे और अभी तीन दिन पहले ही जोखू तिवारी की लम्‍बी बीमारी के बाद मृत्‍यु हो गयी थी। ‘धरपेल’ , यानी नवजीन समूह के कर्मचारियों की यूनियन के नेताओं द्वारा होली के हुड़दंग के नाम पर छापी जाने वाली वार्षिक पत्रिका। इसी पत्रिका का नाम था धरपेल। जोखू प्रसाद तिवारी इसी 64 पेजी धरपेल पत्रिका के संस्‍थापक संपादक-प्रकाशक और सर्वाधिकारी हुआ करते थे।
एक वरिष्‍ठ पत्रकार ने दोलत्‍ती संवाददाता को बताया कि एजे यानी एसोसियेटेड जर्नल यूनियन कांग्रेस के लोगों द्वारा संचालित हुआ करता था। इसी एजे समूह तीन प्रमुख अखबारों का प्रकाशन करता था। हिन्‍दी भाषा में नवजीन, उर्दू में कौमीआवाज, और अंग्रेजी में नेशनल हेराल्‍ड। नवजीवन के एक कर्मचारी ने बड़े दुख के साथ बताया कि यूनियनबाजी के चलते ही यह प्रकाशन संस्‍थान तबाह हुआ और उसी के साथ बर्बाद हुए उसके कर्मचारियों के सपने। हमेशा-हमेशा के लिए उनका भविष्‍य भी तबाह हुआ।
राजधानी की पत्रकारिता में लम्‍बे समय से रहे एक वरिष्‍ठ पत्रकार ने बताया कि धरपेल दरअसल एक घटिया मानसिकता वाले लोगों की घिनौनी सोच का अमली जामा पहनाने वालों की करतूत थी। ऐसे लोगों में से अधिकांश नेता अपनी यूनियनबाजी और पुलिस-प्रशासन व राजनीतिक लोगों में घुसपैठ व धाक बनाये रखने के लिए धरपेल पत्रिका के माध्‍यम से अश्‍लीलता और बेहूदगी की सारी सीमाओं को तोड़ने के अस्‍त्र-शस्‍त्र हुआ करते थे। जाहिर है कि ऐसे पत्रकारों का पत्रकारिता से कोई भी लेना-देना नहीं था, सिवाय इसके लिए वे किसी तरह जोड़-तोड़ करते हुए पत्रकारिता में घुसपैठ कर चुके थे।
इस पत्रकार ने बताया कि धरपेल के संपादन और प्रकाशन में जोखू प्रसाद तिवारी और उनके साथियों ने पूरा जीवन खपा डाला। अपने नाम को ही चरितार्थ करती इस वार्षिक पत्रिका होली के हुड़दंग के नाम पर अश्‍लीलता की सारी सीमाओं को तोड़ने वाली हुआ करती थी। इंटरनेट के पहले तक यह पत्रिका छिछोरे पत्रकारों द्वारा छिछोरे नेताओं और ठेकेदार नुमा सामाजिक कार्यकर्ताओं और व्‍यवसायिक लोगों के बीच खासी साख बनाये रखती थी। (क्रमश:)

(दोलत्‍ती समूह को हमेशा से ही पत्रकारिता के ऐसे पहलू पर हस्‍तक्षेप करने की जरूरत महसूस होती रही है। अपने इसी दायित्‍व को लेकर दोलत्‍ती ने लगातार खबरें छापीं हैं। लेकिन अब यह तय किया गया है कि पत्रकारिता का दोशाला ओढे ब्‍लैक-शीप लोगों पर बाकायदा एक अभियान छेड़ा जाए। हमारा यह प्रयास अब क्रमश: ही रहेगा।
देखते रहिएगा दोलत्‍ती, पढ़ते रहिएगा दोलत्‍ती, महसूस करते रहिएगा दोलत्‍ती)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *